साधु जग बौराना
मुझे ईश्वर से कोई अपेक्षा नहीं है। यहाँ सवाल यह नहीं कि नास्तिक या आस्तिक हूँ ? सवाल यह है कि क्या ईश्वर ने अपने बदौलत किसी को कभी भी कुछ दिया है ? संतुष्टि के अलावा। यहाँ यह भी साफ कर दूं कि "संतुष्टि" भी एक अलग मनोवैज्ञानिक अवस्था है। जिसके लिए ईश्वर की आवश्यकता नहीं है... एक बच्चा अपने माँ के गोद मे जो प्राप्त करता है- चाहे वो किसी मेट्रो स्टेशन पर लेकर उसको बैठी हो- वह भी संतुष्टि है। वहां वह किसी ईश्वर की अवधारणा को नहीं जानता। यह संतुष्टि एक सिक्युरिटी है... जो हर उसको प्राप्त होता है... जो यह समझता है कि उसके ऊपर कोई है। यहाँ एक बात और ध्यान देने वाली है... जो पूरे चौबीस कैरेट आस्तिक थे... उन्ही को यह संतुष्टि भी प्राप्त हो सकी। जैसे जीसस.. कबीर... तुलसी... मीरा.. रैदास , मदर टेरेसा आदि । वहां व्यक्ति रह ही नहीं जाता। इन लोगो को ईश्वर ही चाहिए था, ईश्वर से कुछ नहीं चाहिए था। ईश्वर उनके लिए कुछ प्राप्त करने का साधन नहीं था, अपितु वह केवल जो चाहते हैं वह ईश्वर स्वयं है। प्रेम गली अति साकरी (पतली) दोनों संग ना समाहि मैं था तो हरि नहीं हरि थ...