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Showing posts from March, 2024

Hauz Khas : राहें गुमरहा क्या है

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कहीं पर जाने के लिए कही से निकलना पड़ता है। अपने आराम से थकान के तरफ । क्या मैं ज्ञान देता हुआ लग रहा हूँ?  पता नहीं पर जैसे ही ब्लॉग खोला यह लिखने के लिए पहले लगा कि किसी ऐसे लाइन से शुरू करना चाहिए। जिससे लोग अंत तक पढ़ें।   कुछ कंटेंट राइटिंग का कोर्स कर रहा हूँ, इस लिए भी शायद यह सब हुआ है। किंतु मेरे लिए जो जो भी मैं लिखता हूँ। वह कंटेंट तो है नहीं। हिस्सा है मेरा हिस्सा जो भी मैं कुछ हिस्से भर लोगो के साथ शेयर करना चाहता हूं।  हौज़ खास गया था, दिल्ली में ही। हौज़ खास एक मार्किट भी है और जंगल भी। किला भी, गाँव भी। आधुनिक भी, प्राचीन भी। गरीब भी और समृद्ध भी।  कोई प्लांड भी नहीं था जाना और ऐसा भी नही  था कि निकलने के बाद पहुच गयें मेट्रो स्टेशन , अक्कड़ बक्कड़ कर रहे । प्लांड और इंस्टेंट के बीच। और वहां पहुच कर हम पूरे हो गए।  हमेशा जब आप कहीं पर पहुच कर यह सोचते हो कि यार पाता नहीं कैसी जगह होगी, तो शायद आपके वर्तमान पर आपका भविष्य मुस्कुरा रहा होता है। किसी बच्चे के मासूमियत पर किसी बुजुर्ग की हँसी। और वही हुआ। हम खुश थे, आते आते। हम...

पंकज उदास, मेरे लिए

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क्लास 9th की बात है। रात में ठंडक का समय था। हम कार से अपने गाँव संतकबीर नगर से बस्ती आ रहे थे। भइया गाड़ी चला रहा था। माझले पापा और भइया आगे बैठे थे, मैं पीछे। समय काटने के लिए मैं कार के सीसे पर मुह से भाप मरता और उस भाप से बने ब्लर में कुछ बनाता या सब कुछ मिटा देता। इतने में कार के ऑडियो में एक आवाज गूँजी-   सब चमन से... गुलाब लें आएं हुश्न वाले... शबाब ले आएं  शेख साहब ने मांग ली जन्नत हम वहाँ से शराब ले आएं फिर गाना शुरू हुआ, आवाज भारी और धुन तेज़।  चुम कर मद भरी आँखों से गुलाबी कागज़ उसने भेजा है मेरे नाम शराबी कागज़ गाना पता नहीं क्यो मैं बहुत ध्यान से सुना । गाने में कुछ था जो कि मुझे मोह लिया।  उसके हाथों में गुलाबों की महक है शायद उसके छूने से हुआ पूरा गुलाबी कागज़ तबले पर बोल बज रहे थे। और यू ही गाना कुछ देर में खत्म हो गया। इसके बाद सारे गाने मैं सुनता गया। घर वालो के सामने बोल भी नही  सकता था कि गाना फिर से बजा दीजिए ।  रात को घर पहुचा। पापा का मोबाइल ले कर कोशिश की कि शर्च करु। उस समय मोबाइल में नेट का रिचार्ज कोई करवाता नहीं था। और बिन रिचार्ज के,...