Hauz Khas : राहें गुमरहा क्या है


कहीं पर जाने के लिए कही से निकलना पड़ता है। अपने आराम से थकान के तरफ ।

क्या मैं ज्ञान देता हुआ लग रहा हूँ?  पता नहीं पर जैसे ही ब्लॉग खोला यह लिखने के लिए पहले लगा कि किसी ऐसे लाइन से शुरू करना चाहिए। जिससे लोग अंत तक पढ़ें।
 
कुछ कंटेंट राइटिंग का कोर्स कर रहा हूँ, इस लिए भी शायद यह सब हुआ है। किंतु मेरे लिए जो जो भी मैं लिखता हूँ। वह कंटेंट तो है नहीं। हिस्सा है मेरा हिस्सा जो भी मैं कुछ हिस्से भर लोगो के साथ शेयर करना चाहता हूं। 

हौज़ खास गया था, दिल्ली में ही। हौज़ खास एक मार्किट भी है और जंगल भी। किला भी, गाँव भी। आधुनिक भी, प्राचीन भी। गरीब भी और समृद्ध भी। 


कोई प्लांड भी नहीं था जाना और ऐसा भी नही  था कि निकलने के बाद पहुच गयें मेट्रो स्टेशन , अक्कड़ बक्कड़ कर रहे । प्लांड और इंस्टेंट के बीच। और वहां पहुच कर हम पूरे हो गए। 

हमेशा जब आप कहीं पर पहुच कर यह सोचते हो कि यार पाता नहीं कैसी जगह होगी, तो शायद आपके वर्तमान पर आपका भविष्य मुस्कुरा रहा होता है। किसी बच्चे के मासूमियत पर किसी बुजुर्ग की हँसी। और वही हुआ। हम खुश थे, आते आते। हम बहुत खाली आए थे और बहुत कुछ ले कर जा रहे थे, बैग में भी, मन मे भी, आंखों में भी और उम्मीद में भी। 

उम्मीद में इस लिए की कुछ जगह जो देखनी चाहिए थी... छूट गईं। छूटना भी जरूरी होता है, कहीं फिर लौटने के लिए। इस लिए इस लिखे में भी कुछ छोड़ रहा हूँ, ताकि आप भी.... 

- Divyansh Pathak

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