पंकज उदास, मेरे लिए



क्लास 9th की बात है। रात में ठंडक का समय था। हम कार से अपने गाँव संतकबीर नगर से बस्ती आ रहे थे। भइया गाड़ी चला रहा था। माझले पापा और भइया आगे बैठे थे, मैं पीछे। समय काटने के लिए मैं कार के सीसे पर मुह से भाप मरता और उस भाप से बने ब्लर में कुछ बनाता या सब कुछ मिटा देता।

इतने में कार के ऑडियो में एक आवाज गूँजी-
 
सब चमन से... गुलाब लें आएं
हुश्न वाले... शबाब ले आएं 
शेख साहब ने मांग ली जन्नत
हम वहाँ से शराब ले आएं

फिर गाना शुरू हुआ, आवाज भारी और धुन तेज़। 
चुम कर मद भरी आँखों से गुलाबी कागज़
उसने भेजा है मेरे नाम शराबी कागज़

गाना पता नहीं क्यो मैं बहुत ध्यान से सुना । गाने में कुछ था जो कि मुझे मोह लिया। 

उसके हाथों में गुलाबों की महक है शायद
उसके छूने से हुआ पूरा गुलाबी कागज़



तबले पर बोल बज रहे थे। और यू ही गाना कुछ देर में खत्म हो गया। इसके बाद सारे गाने मैं सुनता गया। घर वालो के सामने बोल भी नही  सकता था कि गाना फिर से बजा दीजिए । 

रात को घर पहुचा। पापा का मोबाइल ले कर कोशिश की कि शर्च करु। उस समय मोबाइल में नेट का रिचार्ज कोई करवाता नहीं था। और बिन रिचार्ज के, बैलेंस से ही चला रहा था । मैने गाने का लिरिक्स सर्च किया। गीत माला के वेबसाइट पर लिरिक्स मिल गया। और वही लिरिक्स पूरा लाल पेन से एक रजिस्टर के पेज पर उतार लिया। खूब पढ़ा और उसी धुन में गाता रहा । 
फिर भी गाने वाली बात नहीं आ रही थी। यह पता चल गया था कि पंकज उदास ने गाई है और कहां उनका गला बाँसुरी और मेरा बाँस।

उस समय ख्वाइशें इतनी सस्ती और आसान नहीं हुआ करती थीं। फिर भी मन था कि सुना जाएं। दो तीन दिन के बाद  समझ मे आया कि सी डी में यह मिल जायेगीं । शहर में झंकार वाले, जहाँ सीडी आदि मिलती थी। 

मैं पचास रुपये जुगाड़ कर के निकल दिया झंकार वाले यहां । दुकान पर भीड़ थी। फ़िल्म गाने की सीडी के लिए प्रसिद्ध दुकान वही थी। इतनी भीड़ में शराब और गुलाब वाले बोल के गाने कैसे मांगता । इस लिए उस दुकान से,जो कि पक्के पर थी, वहां से चला गया आवास विकास के तरफ। 2 किलोमीटर का रास्ता था। वी मार्ट के सामने दो कैसेट वाले लगाया करते थे। वहां पहुचा दो एक लोग दुकान पर पहले से थे। फिर भी मैंने पहले, बचने के लिए ग़ज़ल की सीडी मांगी। 
दुकान वाला मेरे उम्र को और पसंद को देख कर कुछ मुस्कुराया। ग़ज़ल की सीडी का एक पूरा डिब्बा मेरे सामने रख कर वह और लोगो को दिखाने लगा। मैं उस डिब्बे में उल्टा सीधा देखा। टाइटिल देख कर दिल बैठ गया- शराबी शाम के लिए बेहतरीन गज़लें और गीत,  उदासी भरी गज़लें, रोमेंटिक ग़ज़ल, दर्द भरी ग़ज़ल। 
मैं पांच दस मिनट में ऊबा सा हो गया। दुकानदार ने पूछा किसकी ग़ज़ल चाहिए... मैं जानते हुए भी अनजान दिखने के लिए बोला- अरे वो पापा पता नही कौनसा नाम बोल रहे थे- 'उदास ' कर के। 
दुकानदर - पंकज उदास ?
हां हां, 
उंसने फिर दूसरी खेप निकाली। इस वाले में पंकज उदास की गज़लें थीं। बेहतरीन कवर और प्रिंट थम्बनेल में। मैं अब हर अल्बम के गाने देखने लगा। दूसरी या तीसरे पर ग़ज़ल दिखा- चुम कर मद भरी आंखों से, नशा अल्बम। 


अब बारी थी पैसा देखने की। MRP देखा तो 120 रुपये । मेरे पास थे 50। दुकान वाले से पूछने में शर्म लग रहा था। 
मैं बोला - भइया आप की दुकान कब तक खुली रहेगी? 
दुकानदार- 6-7 बजे तक क्यो ? 
मैं - अरे पापा से पूछ लें कि यही वाली चाहिए न... वैसे कितने पैसे की है?
दुकानदार- 40 रुपये की। 
मैं खुश हो गया, पर मामला सही करना था- 40 की है तो लेते जा रहा हूँ, वापस कर लेंगे ?
 
अब वो झल्ला गया- वापस वाला हिसाब नहीं है, दवाई थोड़ी न है... देख जाओ, नाम लिख लो पूछ के आओ ले जाओ। 

मैं - अरे नहीं ... मैं ले जाऊंगा... लाइये... 

यह है पंकज उदास को पाने और निभाने की कथा ।













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