अरे यायावर रहेगा याद? - अज्ञेय
'अरे यायावर रहेगा याद?' के पहले मैं ओशो की 'मैं मृत्यु सिखाता हूं' पढ़ रहा था। क्योंकि इस जीवन के रोज़ मरने और कुछ करने के क्रम में मृत्यु बहुत आकर्षक लगती है। किंतु किताब में बहुत ठहराव था और जीवन में बहुत खलबली। नई जॉब, नए लोग, नया शहर (राज्य कहिए), नए संबंध। क्योंकि किताब अध्यात्म की बात कर रही थी और मैं संसार के विस्तार में संलिप्त था। तो स्वाभाविक ही यह किताब बोझिल लगने लगी और ओशो को मैंने क्षमा के साथ रख दिया। हालांकि, ओशो विरोध करने पर क्षमा कर सकते हैं, किंतु नजरअंदाज करने पर कभी भी नहीं। खैर, किसी तरह से अज्ञेय के साथ मैं और मेरे साथ अज्ञेय इन उत्पात के दिनों में निभा लिए। फिर सारा कुछ सेटल हुआ और मैं भी संतुष्ट हुआ।
अब पहले कुछ दिनों से शेड्यूल यह हो जाता था कि मैं सुबह उठकर पढ़ने बैठ जाता था। 20 पन्ना, 15 पन्ना रोज़। और इस किताब के साथ घूमना भी हुआ खूब, नोएडा, बनारस, बस्ती, खलीलाबाद, गोरखपुर, दिल्ली, गुड़गांव। और इस किताब में भी खूब घुमाया – असम, माझुली, कैलाश, उत्तराखंड, मंडी, कुल्लू-मनाली (यह 1935 के समय का उत्तराखंड था, जब वहां मानव हाथों से कटाई नहीं शुरू हुई थी), अजंता, एलोरा, खुल्दाबाद आदि स्थान।
अज्ञेय को पढ़ने का एक और आनंद है कि आपको मानव मनोविज्ञान की अनायास ही समझ विकसित होने लगती है। और उनके लेखन में एक प्रकार का आकर्षण यह है कि आप इस जीवन वृत्ति को भोगना चाहते हैं जिसे लेखक ने लिखा है – हालांकि यह बिल्कुल आसान नहीं है – और शायद इसलिए आकर्षक भी है। इस किताब में तस्वीर और तहरीर दोनों हैं, और यह खासा उत्सुक भी करती है कि अज्ञेय मात्र भोगने में ही विश्वास नहीं करते थे, किंतु भोगा हुआ सहेजने में भी विश्वास करते थे।
मैं सोचता था कि भोगा हुआ आत्मा अपने आप सहेज लेती है, इस कारण उसे अतिरिक्त उपकरण से नहीं सहेजना चाहिए। किंतु अज्ञेय के दृष्टिकोण और आचरण ने मेरे भी विचारों में परिवर्तन किया। अब मैं भी सहेजने और समेटने में विश्वास करने लगा हूं, किंतु उसके साथ सामंजस्य बैठाने में अभी समय लगेगा…
यहां पर अज्ञेय कहीं मात्र लेखक नहीं हैं, वह कहीं दृष्टा हैं, कहीं विचारक, कहीं जिज्ञासु, कहीं मैकेनिक, कहीं एक खीझ भरा साहब… इसी कारण शायद भाग्य ने उनका नाम अज्ञेय रख दिया।
वैसे इस किताब में एक बात और आप गौर करेंगे कि शीर्षक – 'अरे यायावर, रहेगा याद?' में प्रश्नचिह्न इसलिए है कि यायावर को कहीं यह सब भूल न जाए। इस कारण इसका संचय एक यात्रा वृत्तांत के रूप में लिखा गया है। किंतु किताब पढ़ने के बाद, आप टाइटल देखकर एक संतोष और निश्चिंतता के साथ कह सकते हैं कि 'अरे यायावर, रहेगा याद।'
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