मुझसे क्या हो सका मोहब्बत मे

"अच्छा तो क्या नाम बताया तुमने... हाँ, दिव्या ... उसका और तुम्हारा क्यों ब्रेकअप हुआ?" - विभु ने शिवांग से पूछा।

शिवांग और विभु अभी बनारस के आई.पी. सिगरा मॉल के सीसीडी में बैठे हुए थे। पिछले आधे घंटे से दोनों एक-एक कप कॉफी पी रहे थे और बीच-बीच में बात का कोई टॉपिक खोज रहे थे। फिर विभु कभी शिवांग से कुछ पूछती और कभी शिवांग विभु से।
यह सिर्फ इसलिए हो रहा था ताकि पहली मुलाकात की असहजता कम हो जाए या खत्म हो जाए।

बस इसी कारण विभु ने भी शिवांग से यह सवाल पूछा था। विभु और शिवांग एक-दूसरे को बहुत पहले से जानते थे, करीब दो सालों से। दोनों बनारस के महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ से बीए सेकंड ईयर का कोर्स कर रहे थे।
करीब एक साल तक आई कॉन्टैक्ट, नोट एक्सचेंज, और इंस्टाग्राम के पोस्ट लाइक करने के बाद आज खुद को इतना सहज पा सके कि एक साथ कॉफी पीने आ गए। अगर इस मुलाकात को कोई नाम देना चाहें, तो आप कह सकते हैं कि "वो डेट कर रहे हैं"। पर अगर शिवांग और विभु से पूछा जाए कि "यहाँ क्या कर रहे हो?" तो वे कहेंगे "बस कॉफी पीने आए थे।"




चलिए, अब मैंने आप लोगों को इनका इतिहास तो बता दिया, अब ये रहा भविष्य, यानी कि तीन साल बाद। वे शादी कर चुके थे।

यह कैसे हुआ, यह भी मैं आपको बता दूं। शादी करना कोई बड़ी बात नहीं होती अगर आप अच्छा पैसा कमाते हों। मेरा मतलब लड़का और लड़की दोनों से है। हाँ, यही हुआ शिवांग और विभु के साथ। शिवांग एक कवि था। वो भी प्रोफेशनल कवि। प्रोफेशनल इन द सेंस कि उसकी लेखनी में कुछ बात थी। वह बेहतरीन गीत-कविताएँ लिखता था, जो दिल से बात करती थीं। हालांकि वह इतना फेमस नहीं था, पर उसके कुछ गाने वेब सीरीज़ वगैरह में ले लिए गए थे। इसलिए चाहे उसका सोशल स्टेटस हो या न हो, उसका आर्थिक स्तर बेहतरीन था।

बस यही कारण था कि उन्हें 24 की उम्र में शादी करने में कोई दिक्कत नहीं हुई। विभु भी अच्छे परिवार से थी। वह भी एमए इंग्लिश में यूनिवर्सिटी टॉपर रही थी।
अभी-अभी एमिली डिकिंसन की कविताओं पर पीएचडी करने की तैयारी कर रही थी और उसका जेआरएफ फैलोशिप भी हो रखा था।

पर उसका जीवन और करियर को लेकर एक अलग दृष्टिकोण था। वह चाहती थी कि उसका ज्ञान या रिसर्च इंग्लिश लिटरेचर में एक नई बहस छेड़ दे।




इसीलिए वह शादी नहीं करना चाहती थी। लेकिन शिवांग के रिश्ते में उसे यह समझ में आ गया था कि शिवांग कभी उसकी स्वतंत्रता में दखल नहीं देगा। वह खुद भी बहुत रिज़र्व रहता था, रात-रात भर अपने किताबों के साथ अलग कमरे में पड़ा रहता। यहाँ तक कि कभी-कभी विभु इस बेख्याली से परेशान हो जाती और यह चेक करने की कोशिश करती कि उसका 'शिव' उसे पसंद करता है या नहीं।
उसे यह स्वतंत्रता कभी-कभी अकेलापन लगने लगती। पर शिवांग की स्थिति, उसके व्यवहार, और उसके होने से ही उसे यह अहसास हो जाता कि वह कभी ऐसा नहीं करेगा।



विभु को बचपन से ही कभी अकेले नहीं सो पाती थी, उसे कोई न कोई चाहिए होता जिसके ऊपर वह पैर फैलाकर सो सके। वो चाहे टेडी हो, कोई लड़का, लड़की या उसका कंबल हो। पर शिवांग अपने रूटीन का इतना पाबंद था कि जैसे ही साढ़े बारह बजते, वह विभु को बिस्तर पर छोड़ किचन में जाकर एक कप काली मसाला चाय बनाता, एडवांस सिगरेट सुलगाता और अपनी कुर्सी पर बैठकर 'टाइम्स ऑफ इंडिया' में कोई रिपोर्ट पढ़ने लगता। देर तक वह आंख गड़ाकर पढ़ता रहता, नहीं तो किसी कविता को सुधारने में लगा रहता।



सुबह चार बजे के आसपास वह बिस्तर पर आता, एक बार विभु के माथे पर उसके सोते वक्त चूमता और फिर खिड़की के बाहर आसमान को काले से बैंगनी और बैंगनी से नारंगी होते निहारता रहता, फिर सो जाता।

विभु फिर भी उसके रवैये से कभी नहीं उबती, पता नहीं क्यों। शायद शिवांग के धैर्य की वजह से, या उसके जीवन के नज़रिए की वजह से, या शायद उसकी ईमानदारी हो, जो जैसा है उसे वैसा ही मान लेने की वजह से।

विभु ने कभी शादी नहीं की होती। यहाँ तक कि शिवांग खुद भी कहता था, "यार बेबो, एक बात बता दूं, तुम मेरे साथ 24 घंटे एडजस्ट नहीं कर पाओगी, कभी भी नहीं। क्योंकि मैं खुद अपने साथ एडजस्ट नहीं कर पाता।"
पर विभु को शादी करनी थी, तो उसने शिवांग से ही शादी करने की सोची। अरेंज मैरिज से अच्छा वही जिसे वह अपनी जिंदगी का हिस्सा मानती थी।
खैर, यह तो रही मैरिज की बात। पर हम यह कहानी शुरू कहाँ से किए थे? सही, सीसीडी, आईपी सिगरा, बनारस से। वहां आपने एक बात गौर की थी, वही बात जो दोनों के बीच घट चुकी थी—‘दिव्या’ को लेकर।

दिव्या, वह खालीपन है जो शिवांग की ज़िन्दगी में भरा हुआ था। क्लास दसवीं में शिवांग और दिव्या की मुलाकात हुई थी। दोनों पढ़ाई में अव्वल, शिवांग अपनी पढ़ाई और मार्क्स को लेकर हमेशा असुरक्षित महसूस करता था। वह अपने नोट्स बहुत ही ध्यान से बनाता, इस डर से कि कोई उनसे नकल न कर ले। जबकि दिव्या पढ़ाई का आनंद लेती थी।

शिवांग, जो दिन-रात अपने दिमाग में फॉर्मूलों, इतिहास की तारीखों और घटनाओं को दोहराता रहता, वहीं दिव्या घंटी के बीच के समय में रोमांटिक नावेल पढ़ा करती थी। शिवांग यह देखकर खुश होता, नहीं, गर्व महसूस करता था कि दिव्या कभी उससे ज्यादा नंबर नहीं ला पाएगी। लेकिन इस रेस में कब शिवांग और दिव्या एक साथ पढ़ने लगे, इसका एहसास ही नहीं हुआ।


क्लास में सुमन सर ने एक दिन शिवांग और दिव्या को साथ बैठा दिया, और तभी से दिव्या ने शिवांग को ‘सेक्सी’ कहकर बुलाना शुरू कर दिया—शरीर के आधार पर, क्योकि शिवांग पतला-दुबला था। और पता नहीं कब शिवांग दिव्या को ‘बाबू’ कहने लगा। वह उसके लिए नोट्स बनाने लगा, और जब दिव्या के दसवीं में 86% आए और शिवांग के 79%, तब भी शिवांग खुशी-खुशी हनुमानगढ़ी में एक पाव लड्डू चढ़ा आया।


फिर एक दिन, जब शिवांग ने बार-बार फोन किया, तो दिव्या ने झल्लाते हुए कहा, “शिवांग, बुरा मत मानना, लेकिन एक बात कहूं? मुझे दिनभर फोन मत किया करो।” उसी दिन से शिवांग के प्लेलिस्ट में पंकज उधास, जगजीत सिंह और कुमार के कविताएं जुड़ गईं। धीरे-धीरे शिवांग गाने लगा और फिर खुद भी लिखने लगा।

यहीं से शिवांग उपाध्याय का ‘शिव’ बनना शुरू हुआ।

विभु अक्सर सोचती, "इसको चाहिए क्या? यह हमेशा अकेले क्यों रहना चाहता है?" जब वह मजाक में पूछ लेती, "अच्छा शिव, तुम खुद को इतना बाधे हुए क्यों रखते हो?"

शिवांग हंसते हुए कहता, "देखो बेबो, जितने भी म्यूजिकल इंस्ट्रूमेंट्स होते हैं, वे भीतर से खोखले होते हैं, तभी उनमें संगीत आता है। मैं भी अपने अंदर के आर्टिस्ट के लिए इस भरी दुनिया में एक खालीपन बचाना चाहता हूं।"

विभु हारकर कहती, "अरे मेरे फिलॉस्फर जी, ज़िंदगी क्या है? किताबों को हटाकर देखो!"

विभु को शिवांग का यह रिजर्व एटीट्यूड हमेशा आकर्षित करता रहा था। कॉलेज के दिनों में वह हिंदी की क्लास में सबसे पहले आता और टीचर के डाइस के पास बैठ जाता। विभु भी जल्दी आ जाती, क्योंकि क्लास खचाखच भरी रहती थी। शिवांग भीड़ में भी किसी आउट ऑफ सिलेबस किताब में मुंह धंसाकर पढ़ता रहता।

शिवांग का चेहरा कभी खास आकर्षक नहीं था, लेकिन उसका एटिट्यूड और रिजर्वनेस क्लास के लिए कौतूहल का विषय था।

एक बार शिवांग ने विभु को बताया, "बेबो, मैं भी चाहता था कि क्लास में कुछ ऐसा करूं कि लड़कियां मुझे नोटिस करें, खासकर तुम। पर मैं सब इतने प्लान और तरीके से करता था कि किसी को आभास भी न हो।"

शिवांग जानता था कि हर किसी की जिंदगी में एक समय आता है जब चाहत आहात में बदल जाती है। जिसे हम सबसे ज्यादा प्यार करते हैं, वही हमारे लिए सबसे बड़ा भार हो जाता है।

शादी के बाद शिवांग को लगने लगा था कि अब शायद प्यार मुरझा गया है। वही फुल जो कभी शाख पर खिले थे, अपने आपकों नोचने की भीख मांग रहे थे।





एक रात, शिवांग गुरुदत्त की कहानियां पढ़ रहा था। मेज पर हाईलाइटर फंसाकर किताब रखी और बेडरूम में गया। देखा कि विभु मोबाइल पर कुछ देख रही थी। वह तकिये के पास बैठ गया।

"बेबो, क्या कर रही हो?"

"तुम्हारे लिए एक कुर्ता देख रही हूं, तुम तो किताबों और कविताओं के सिवा कुछ देख भी नहीं सकते।"

शिवांग - "कब तक मेरे लिए जियोगी?"

विभु - "कौन तुम्हारे लिए जी रहा है? अभी उस दिन तुम मौसी के यहां वही येलो कुर्ता पहन कर चले गए, जो तुम मम्मी-पापा के कथा सुनने पर पहने थे। मौसी सोच रही होंगी कि इसके पास एक ही कुर्ता है!"

शिवांग हंसते हुए - "अच्छा बेटा, तो तुम मेरे लिए नहीं, अपने पति के लिए शॉपिंग कर रही हो!"

विभु ने कोहनी मारते हुए कहा - "मेरा पति इतना पतित आदमी है, कोई क्या करे!"

फिर अचानक गंभीर होकर बोली, "शिवांग, तुम्हें कुछ कहना है न?"

शिवांग ने सोचा कि अब वह यह नहीं कह पाएगा कि प्यार मुरझा गया है।

सुबह, चाय पीते हुए शिवांग ने कहा, "विभु, क्या तुम अब भी मुझसे प्यार करती हो?"

विभु ने मुस्कराते हुए जवाब दिया, "प्यार?... प्यार तो पता नहीं, पर तुम वो हो जिसके साथ होना अच्छा लगता है

शिवांग - "मुझे कुछ दिनों से लग रहा है, कि आजकल मैं तुम्हारे साथ वह फुलफिलमेंट नहीं खोज पा रहा हूँ…"

विभु चाय का कप ट्रे में रखकर शिवांग की तरफ देखते हुए, ठिठक गई - "क्यों?"

शिवांग - "यार, पहले मैं तुम्हारे साथ चुप रहकर भी सहज रह लेता था… जैसे बातें करना हमारे रिश्ते का माध्यम नहीं थी। किंतु अब मैं कभी-कभी तुमसे बेईमानी वश बात करने लगता हूँ, सिर्फ इसलिए कि तुम कंफर्टेबल महसूस करो।"

विभु - "तो कंफर्टेबल क्यों करना चाहते हो मुझे?"

शिवांग - क्योंकि अब तुम एहसाह नहीं, जिम्मेदारी हो गई हो.... और जिम्मेदारी निभानी पड़ती है

शिवांग - "अब मुझे लगता है कि आज नयापन हमारे प्यार में, हमारे साथ में नहीं रह गया है… क्या हम अलग हो जाएं?"


विभु - "ओके शिव… एज यू विश…"

शिवांग - "तुम्हारी कोई विश नहीं है?"

विभु - "अभी तक तुमसे बड़ी कोई विश थी ही नहीं"

शिवांग - "कहाँ रहेगी?"

विभु (आंख मारकर) - "तुम्हारे खुशी में..."




दस दिन बाद विभु जब नए फ्लैट में सैटल हो गई थी, उसने अपने एक ट्रॉली से सामान निकाला। उसमें एक कागज पर लिखा था:

"खामोशी से अदा हो रस्में दूरी
कोई हंगामा बरपा क्यों करे हम।"





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