छाया

वो मेरे साथ ही बैठा है। आगे वाले सीट पर। चुप चाप, कान में महंगे वाले हेडफोन लगाए हुए। अपने आस पास के लोगो से अनजान, या जिसको फर्क नहीं पड़ता । फोन में शायद उसके कोई अमेरिकन ऑर्केस्ट्रा चल रहा है। मैंने कोशिश की पर दिखा नहीं । 

उसको भी शायद मेरे बारे में पता होगा। मुझे उसके बारे में पता है, और जिज्ञासा भी। इस लिए भी की आखिर छाया को उसमे क्या दिखा होगा? क्यो वह उसको वहां तक ले आईं। उसका शांत और एकाग्र उथल-पुथल वाला मन? जिसके वजह से वह एक राज की तरह लगता है। और बेहद आकर्षित करता है, राज किसी को भी। यहां तक मुझे भी कर रहा है। मैं उसमे अपने आपकी परछाई पा रहा हूँ। 

तो क्या वो छाया को मात्र दोस्त समझता है? किंतु उस दिन रात में उसके और छाया के बीच की खामोशी भारी बातचीत उसको, दोस्ती से आगे ले जा रही थी। जिसको देख कर मैं दहल गया था। पीछे मेरा दम घुट रहा था। जैसे कोई मुझे पकड़ के झाँपिला दे। वो आर्टिस्ट है, कुछ डिजिटल डिज़ाइन बनाता है। और शायद यही कारण है, कि छाया उसको पसंद आई। छाया खुद आर्ट है। चुल बलि सी, खुद के भीतर खुद को धोती हुई। कोई भी आर्टिस्ट हिल जाएगा।

अभी वो छाया से ही बात कर रहा है। यह सफर बहुत घुटन भरा है। उंसने छाया को किसी यूट्यूब वीडियो की लिंक दी है, छाया के व्हाट्सएप पर। मुझमें फिर बेचैनी जगह बना रही है, फिर अपने आपको मैं बौना समझ रहा हूँ। जिसके हाथ मे कुछ बाकी नहीं है। 

एक भिखारी की तश्वीर बन रही है, मेरे जेहन में। जो की भीख मांगते मांगते सड़क पार कर रहा है। एक तेज़ गाड़ी आयी, भिखारी ने अपना कदम आगे बढ़ाया और गाड़ी ने भिखारी को टक्कर मारी। भिखारी के हाथ से कटोरा दूर उड़ गया। भिखारी सड़क पर गिर गया, मर गया। पर मरने के बाद आंखे खुली थी, आंखों में आकाश दिख रहा था। हाथ भी सड़क पर खुले थे। जैसे ऊपर आसमान से कोई भीख मांग रहा हो। भगवान से, उसको पता चल गया, कि इंसान केवल ठोकर दे सकते हैं, मौत दे सकते हैं, जलिलियत दे सकते हैं, पर भीख नहीं दे सकते। मैं वही भिखारी तो नहीं? मरने के पहले वाला भिखारी। जो अभी सड़क से लोगो से उम्मीद लगाए हुए है। 

- दिव्यांश पाठक


Comments

Popular posts from this blog

अरे यायावर रहेगा याद? - अज्ञेय

पंकज उदास, मेरे लिए

साधु जग बौराना